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تو بريدهي دل و جان من آنچنان نكوئي |
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كه به غير از آستانت نروم به هيچ سوئي |
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نه دلم برام ياري نه سرم به خاك كوئي |
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«همه هست آرزويم كه ببينم از تو
روئي» |
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«چه زيان ترا كه من هم برسم به
آرزوئي» |
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چه شود كه همچو خاري به كنار گل نشينم |
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كه چو شمع آب گردد همه جان آتشينم |
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نه همين منم كه مشتاق جمال نازنينم |
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«به كسي جمال خود را ننمودهاي و
بينم» |
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«همه جا به هر زباني بُوَد از تو گفتگوئي» |
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به زمانهاي كه هرگز اثر از وفا نجويم |
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به كجا برم شكايت غم دوست با كه گويم |
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به رهت اگر بميرم ره ديگري نپويم |
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«به ره تو بسكه نالم ز غم تو بسكه مويم» |
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«شدهام ز ناله نالي شدهام ز مويه موئي» |
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همه هست چشم ساقي و مي عقيق رنگي |
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نه چو من كه شوخچشمي زده ساغرم به سنگي |
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همه شهد عيش در كام و نصيب ما شرنگي |
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«همه را خوش آنكه مطرب بزند به تار چنگي» |
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«من از آن خوشم كه چنگي بزنم به تار موئي» |
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چه خوش است اگر كه پيكي ز تو آورد پيامي |
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بنوازد عاشقان را به نوازش كلامي |
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چه شود كه ماه مهري بدمد ز تيره شامي |
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«چه شود كه راه يابد سوي آب تشنه كامي» |
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«چه شود كه كام جويد ز لب تو كامجوئي» |
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بدرآي همچو مهر از افق حجاب رحمت |
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به سياه نامه خطي بده از كتاب رحمت |
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به لب گناهكاران نمي از شراب رحمت |
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«شود اينكه از ترحم دمي اي سحاب رحمت» |
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«من خشك لب هم آخر ز تو تر كنم گلوئي» |
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چكنم كه مبتلايم به بلاي چشم مستت |
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همه هست جام عشقم به هواي چشم مستت |
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چه غم ار كه بشكند دل ز جفاي چشم مستت |
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«بشكست اگر دل من بفداي چشم مستت» |
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«سر خمّ مي سلامت شكند اگر سبوئي» |
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منم و دلي اسير غم و درد و رنج دنيا |
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نه ز دوستان مروّت نه ز دشمنان مدارا |
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همه را مي مرادست به ساغر تمنا |
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«همه موسم تفرج به چمن روند و صحرا» |
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«تو قدم به چشم من نه بنشين كنار جوئي» |
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به ديار بيوفايان سخن از وفا چه گويم |
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دل درد آشنائي به مراد دل نجويم |
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نه توان اينكه دست از غم عشق او بشويم |
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«نه به باغ ره دهندم كه گلي به كام بويم» |
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«نه دماغ آنكه از گل شنوم به كام بوئي» |
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من و جان دردمندي من و كام نامرادي |
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چو شكسته بالي افتاده به چنگ تندبادي |
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نه به شام دل سياهم خبري ز بامدادي |
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«نه وطن پرستي از من به وطن نموده يادي» |
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«نه زمن كسي به غربت بنموده جستجوئي» |
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غم و درد آشنا را بجز آشنا نداند |
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كه طبيب دردمندان به علاج در نماند |
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نه چو زاهد از حريم در كعبهام براند |
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«ز چه شيخ پاكدامن سوي مسجدم نخواند» |
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«رخ شيخ و سجده گاهي سر ما و خاك كوئي» |
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مهر 1381 خورشيدي - سالزبورگ |